कुछ याद नहीं...
क्या बिसरूं, क्या याद करूं,
क्योंकर याद करूं?
क्यों बीती बातें रख
दिल में आबाद करूँ,
तुम्हारे संग बिताये,
पल जो अपने थे,
बेमाने हुए वे क्षण,
सुहाने सपने थे,
उन पलों को मन में रख
जीवन बरबाद करूँ?
क्या बिसरूं क्या याद करूं,
कुछ याद नहीं...
बचपन का निश्छल प्रेम
लगा था जो अपना,
खेल खेल में हंसी ठठा
था प्यारा सपना,
मस्ती में घंटों बैठ
गाना, बतियाना,
सुरमई रातों में
नदी किनारे पर जाना,
उस गुज़रे प्रेमालापों से
आज को आज़ाद करूँ ,
स्वप्निल गुज़रे पलों को
अब क्यों याद करूं,?
क्या बिसरूं, क्या याद करूं,
क्योंकर याद करूं?
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